Hundreds Of Tons Of Heavy Rock Shakes With Just A Touch Of A Finger, A Wonderful Piece Of Mechanics Of The Mah – Himachal: अंगुली के मात्र एक स्पर्श से हिल जाती है सैकड़ों टन भारी चट्टान, लाखों लोगों की आस्था का केंद्र

सार

हिमाचल में मंदिरों से जुड़ी देव आस्था की बातें हर किसी को हैरान कर देती हैं। हालांकि इसके वैज्ञानिक पहलू भी हैं लेकिन देव आस्था इन वैज्ञानिक पहलुओं पर हावी रहती है। सैकड़ों टन भारी ऐसी चमत्कारिक चट्टान है, जो ताकत से नहीं अंगुली के एक स्पर्श से हिलती है। 

हिमाचल के कई मंदिर रहस्यों से भरे पड़े हैं। इन मंदिरों से जुड़ी देव आस्था की बातें हर किसी को हैरान कर देती हैं। हालांकि इसके वैज्ञानिक पहलू भी हैं लेकिन देव आस्था इन वैज्ञानिक पहलुओं पर हावी रहती है। प्रदेश के मंडी जिले के जंजैहली के कुथाह में सैकड़ों टन भारी ऐसी चमत्कारिक चट्टान है, जो ताकत से नहीं अंगुली के एक स्पर्श से हिलती है। महाभारत काल का यांत्रिकी का अद्भुत नमूना आज भी लाखों लोगों की आस्था का केंद्र बना हुआ है। इस विशालकाय चट्टान को पांडव शिला कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि पांडव अपने अज्ञातवास के दौरान यहां रुके और पांडव शिला को निशानी के तौर पर रखा। यांत्रिकी में निपुण गदाधारी भीम ने इस बड़ी चट्टान को कुछ इस प्रकार संतुलन बनाकर रखा, जिसे कोई भी व्यक्ति एक अंगुली से हिला सके। आज तक शिला उस स्थान से नहीं हटी है। यह विशालकाय चट्टान एक छोटी चट्टान पर टिकी हुई है, जो लोगों के लिए अजूबा है।

पत्थर चट्टान पर अटके तो होती है मनोकामना पूरी
मान्यता है कि आस्था के रूप में और अपनी मनोकामना की पूर्ति के लिए लोग इस पांडव शिला पर छोटे पत्थर फेंकते हैं। यदि पत्थर इस भारी भरकम चट्टान पर ही अटक जाए तो पत्थर फेंकते वाले व्यक्ति की मनोकामना पूर्ण हो जाती है। यदि चट्टान पर न अटके और नीचे गिर जाए तो माना जाता है कि उस व्यक्ति की मनोकामना पूरी नहीं हो पाती। इस तरह से पर्यटक यहां आने के बाद पत्थर फेंककर अपना भाग्य अजमाते हैं।

यह है विशेषता
इस चट्टान को बुलडोजर, जेसीबी या सामूहिक बल से हिला पाना ही संभव है। लेकिन, पांडव शिला की यह विशेषता है कि इसे एक अंगुली से हिलाया जा सकता है। जिसके कारण यह लोगों के आकर्षण का केंद्र वर्षों से बनी हुई है। महाभारत काल की यह चट्टान पांडव शिला जंजैहली के कुथाह के पास है। 

देश-विदेश से आते हैं पर्यटक
पांडव शिला को देखने के लिए प्रदेश के अलावा देश-विदेश से लोग यहां पहुंचते हैं। आस्था का केंद्र बन चुकी पांडव काल की इस शिला को लोग अंगुली से या फिर अपने दोनों हाथों से हिलाते भी हैं ताकि इसकी सच्चाई को जान सकें। 

विकसित होगी  पांडव शिला
एक अंगुली से हिलने वाली यह पांडव शिला अब पर्यटन की दृष्टि से विकसित की जा रही है। जिसकी कवायद पर्यटन विभाग ने शुरू की है। मंडी पर्यटन विभाग ने इस क्षेत्र को विकसित करने का प्लान तैयार किया है। अब तक लापरवाही का शिकार होती आ रही पांडव शिला क्षेत्र में अब लोगों को हर सुविधा मिलेगी। प्रस्ताव मंजूरी के लिए सरकार को भेजा गया। 

यह रोचक दंतकथा भी प्रचलित
पांडव शिला के बारे में एक रोचक दंत कथा प्रचलित है। दंतकथा के अनुसार जब पांडवों व कौरवों के बीच युद्ध हुआ तो बहुत से कौरव मारे गए।  पांडवों को कहा गया कि इन हत्याओं के पाप को धोने के लिए उन्हें वृंदावन जाकर नंदी बैल के दर्शन करने होंगे। पापों से मुक्ति के लिए पांडव वृंदावन के लिए निकल गए और जब वहां पहुंचे तो पता चला कि नंदी बैल तो यहां से चला गया है। ऐसे में पांडव नंदी बैल का पीछा करते-करते हिमाचल प्रदेश के रिवालसर, कमरूनाग होते हुए इस क्षेत्र में पहुंच गए। इसी प्रवास के दौरान पांडव यहां पर रुके और जब वह खाना खा रहे थे तो ऊपर पहाड़ी पर बसे एक गांव से एक शव बाखली खड्ड के किनारे जलाने के लिए लाई गई। पांडवों ने शव को देखकर खाना छोड़ दिया। उस समय महाबली भीम के हाथों में सत्तू का पेड़ा था। अचानक शव को देखकर खाना छोड़ने पर वह पेड़ा भी भीम से छूट गया जो बाद में पांडव शिला कहलाया। समय बीतने के साथ साथ यह शिला लोगों की आस्थाओं के साथ जुड़ गई।

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