Paddy Crop Should Not Be Damaged Due To Waterlogging, Scientists Are Doing Research – Karnal: जलभराव से धान की फसल को न हो नुकसान, वैज्ञानिक कर रहे अनुसंधान

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बढ़ते तापमान और अनियमित बारिश से प्रभावित हो रहे खाद्यान्न और पशुधन की चुनौतियों से निपटने के लिए देश के वैज्ञानिकों ने क्रांतिकारी बदलाव की ओर कदम बढ़ा दिए हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान केंद्र (आईसीएआर) करनाल से संबद्ध देश के कई बड़े संस्थान जहां हीट टॉलरेंट प्रजातियों के उत्पादन की ओर बढे़ हैं, वहीं अब मानसूनी हमले और बेरुखी से निपटने को धान की ऐसी प्रजातियां तैयार करने में जुट गए हैं, जो भले ही चार से पांच दिन पानी में डूबी रहे, लेकिन उन्हें नुकसान नहीं पहुंचेगा। देश में फसल चक्र को पीछे खिसकाने, कम समय में पकने वाली व अधिक ताप सह सकने वाली प्रजातियां तैयार करने पर भी मंथन चल रहा है।
 
करनाल आए राष्ट्रीय जलवायु समुत्थान कृषि में नव प्रवर्तन (निकरा) की विशेषज्ञ समिति के समन्वयक एवं केंद्रीय बारानी कृषि अनुसंधान संस्थान हैदराबाद के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. एम.प्रभाकर ने अमर उजाला से विशेष बातचीत में बताया कि पिछले कुछ समय से मौसम में जो परिवर्तन देखा गया है, वह निश्चित ही चिंता का विषय है।

मार्च-2022 का तापमान सामान्य से काफी अधिक चला, जिससे कई फसलों का उत्पादन प्रभावित हुआ। इसी तरह देश में हो रही अनियमित बारिश देखने को मिल रही है। फसल चक्र की दृष्टि जो बारिश होती थी, अब वह नहीं हो रही है। कहीं जगह कई दिनों तक सूखे की स्थिति बनी रहती है तो कहीं बादल फटने तो अत्यधिक बारिश से धान की फसल कई दिन तक पानी में डूब जाती है। दोनों ही परिस्थितियों में फसल को नुकसान पहुंचता है।

फसल पकने के समय 25 से 30 डिग्री सेल्सियस तक तापमान रहना चाहिए। मौसम के अनियमित दौर में फसल चक्र को पीछे करना भी उचित रहेगा। यानी धान जैसी फसलों की बुवाई निर्धारित समय से पहले हो। दूसरा, ऐसी किस्मों पर जोर दिया जाए जो कम समय में पकने वाली हो लेकिन उत्पादन अधिक हो।

हीट टॉलरेंट हों। ऐसी किस्मों पर पूसा संस्थान दिल्ली और गेहूं एवं जौ अनुसंधान संस्थान करनाल सहित देश के विभिन्न अनुसंधान संस्थानों व विश्वविद्यालयों में काम शुरू हो चुका है। लेकिन अब बारिश के अनियमित दौर को देखते हुए धान की ऐसी प्रजातियां तैयार की जा रही हैं। जिनके खेतों में चाहे चार से पांच दिन भी लगातार पानी भरा रहे, तो भी धान की फसल को कुछ नहीं होगा। जिससे देश के किसानों की एक बड़ी चिंता खत्म हो जाएगी।

इस पर धान अनुसंधान संस्थान कटक के साथ-साथ कृषि विश्वविद्यालय आंध्रप्रदेश, तेलंगाना और हिसार (हरियाणा) की यूनिवर्सिटी पर काम शुरू हो गया है। खास बात ये है कि इन प्रजातियों का उत्पादन भी पहले की अपेक्षा काफी बेहतर होगा।

इसी क्रम में धान एवं गेहूं की फसलों के साथ-साथ सब्जियों पर भी तापमान और बारिश के प्रभाव को बेहद कम करने के लिए अनुसंधान शुरू हो चुका है। इसके लिए टमाटर आदि कई सब्जियों की नई किस्में तैयार हो रही हैं। जिनका उत्पादन भी पहले की अपेक्षा बढ़ेगा।

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बढ़ते तापमान और अनियमित बारिश से प्रभावित हो रहे खाद्यान्न और पशुधन की चुनौतियों से निपटने के लिए देश के वैज्ञानिकों ने क्रांतिकारी बदलाव की ओर कदम बढ़ा दिए हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान केंद्र (आईसीएआर) करनाल से संबद्ध देश के कई बड़े संस्थान जहां हीट टॉलरेंट प्रजातियों के उत्पादन की ओर बढे़ हैं, वहीं अब मानसूनी हमले और बेरुखी से निपटने को धान की ऐसी प्रजातियां तैयार करने में जुट गए हैं, जो भले ही चार से पांच दिन पानी में डूबी रहे, लेकिन उन्हें नुकसान नहीं पहुंचेगा। देश में फसल चक्र को पीछे खिसकाने, कम समय में पकने वाली व अधिक ताप सह सकने वाली प्रजातियां तैयार करने पर भी मंथन चल रहा है।

 

करनाल आए राष्ट्रीय जलवायु समुत्थान कृषि में नव प्रवर्तन (निकरा) की विशेषज्ञ समिति के समन्वयक एवं केंद्रीय बारानी कृषि अनुसंधान संस्थान हैदराबाद के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. एम.प्रभाकर ने अमर उजाला से विशेष बातचीत में बताया कि पिछले कुछ समय से मौसम में जो परिवर्तन देखा गया है, वह निश्चित ही चिंता का विषय है।

मार्च-2022 का तापमान सामान्य से काफी अधिक चला, जिससे कई फसलों का उत्पादन प्रभावित हुआ। इसी तरह देश में हो रही अनियमित बारिश देखने को मिल रही है। फसल चक्र की दृष्टि जो बारिश होती थी, अब वह नहीं हो रही है। कहीं जगह कई दिनों तक सूखे की स्थिति बनी रहती है तो कहीं बादल फटने तो अत्यधिक बारिश से धान की फसल कई दिन तक पानी में डूब जाती है। दोनों ही परिस्थितियों में फसल को नुकसान पहुंचता है।

फसल पकने के समय 25 से 30 डिग्री सेल्सियस तक तापमान रहना चाहिए। मौसम के अनियमित दौर में फसल चक्र को पीछे करना भी उचित रहेगा। यानी धान जैसी फसलों की बुवाई निर्धारित समय से पहले हो। दूसरा, ऐसी किस्मों पर जोर दिया जाए जो कम समय में पकने वाली हो लेकिन उत्पादन अधिक हो।

हीट टॉलरेंट हों। ऐसी किस्मों पर पूसा संस्थान दिल्ली और गेहूं एवं जौ अनुसंधान संस्थान करनाल सहित देश के विभिन्न अनुसंधान संस्थानों व विश्वविद्यालयों में काम शुरू हो चुका है। लेकिन अब बारिश के अनियमित दौर को देखते हुए धान की ऐसी प्रजातियां तैयार की जा रही हैं। जिनके खेतों में चाहे चार से पांच दिन भी लगातार पानी भरा रहे, तो भी धान की फसल को कुछ नहीं होगा। जिससे देश के किसानों की एक बड़ी चिंता खत्म हो जाएगी।

इस पर धान अनुसंधान संस्थान कटक के साथ-साथ कृषि विश्वविद्यालय आंध्रप्रदेश, तेलंगाना और हिसार (हरियाणा) की यूनिवर्सिटी पर काम शुरू हो गया है। खास बात ये है कि इन प्रजातियों का उत्पादन भी पहले की अपेक्षा काफी बेहतर होगा।

इसी क्रम में धान एवं गेहूं की फसलों के साथ-साथ सब्जियों पर भी तापमान और बारिश के प्रभाव को बेहद कम करने के लिए अनुसंधान शुरू हो चुका है। इसके लिए टमाटर आदि कई सब्जियों की नई किस्में तैयार हो रही हैं। जिनका उत्पादन भी पहले की अपेक्षा बढ़ेगा।

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